विज्ञान VS अध्यात्म (सनातन धर्म): एक विश्लेषण (Science VS Spirituality (Sanatan Religion): An Analysis)

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अगर हम विज्ञान और अध्यात्म कि बात करेंगे तो कई सारे प्रश्न चिन्ह विज्ञान पर और कई सारे प्रश्न चिन्ह अध्यात्म पर खड़े हो जाएंगे लेकिन आज मैं जो विश्लेषण करने जा रहा हूँ वो बहुत अनोखा और अलग है| आप को भी मजा आएगा|

आज के समय कि शिक्षा व्यवस्था ज्यादातर विज्ञान के इर्द-गिर्द घूमती हैऔर हमे वही पढ़ाया जाता है जो विज्ञान के अनुसार सिद्ध है अगर किसी कहानी को विज्ञान ने सिद्ध नहीं किया है तो उसे काल्पनिक मान लिया जाता है| जैसे रामायण और महाभारत|

तो क्या जो विज्ञान कहता है सच्चाई वही तक है? या उससे परे है| इसको समझने कि कोशिश करेंगे और साथ में ये भी समझने कि कोशिश करेंगे कि आज का पढ़ा लिखा समाज कितनी सच्चाई तक विश्वास करता है और हकीकत में वो कहा पर खड़ा है| उससे पहले हमे अध्यात्म और विज्ञान में अंतर समझना जरुरी है|

विज्ञान को अगर संक्षेप और सरल भांषा में परिभाषित किया जाए तो हर वो वस्तु जिसके अस्तित्व के होने का सबूत है उसमे विज्ञान विश्वास करता है|

अध्यात्म को अगर सरल भांषा में समझा जाए तो ये विज्ञान के परे है जिसको आज कल अलौकिक(Supernatural ) कहा जाता है| इसका ज्यादातर संबंध धर्म से होता है और वो भी खास कर सनातन धर्म|

अब बात करते है समाज कि तो समाज में रहने वाले साधारण पढ़े लिखे व्यक्ति जो किताबो में विज्ञान द्वारा सिद्ध किया गया है उसको सही मानते है और अध्यात्म को काल्पनिक मानते है और धीरे-धीरे अध्यात्म में विश्वास कम होता जा रहा है क्यों कि किताबो में विज्ञान को इस तरह से पढ़ाया जाता है कि जो विज्ञान कहता है सच्चाई वही तक और जो अध्यात्म कहता है वो एक कल्पना है| पढ़े-लिखे समाज में ये भावना बनती जा रही है कि अध्यात्म तो वास्तव में एक कल्पना है|

वैसे आपके ज्ञान के लिए बता दूँ कि एक समय हिंदुस्तान में अध्यात्म का बोल बाला था और आज धीरे -धीरे विज्ञान उसकी जगह लेता जा रहा जो कि आने वाले समय में हिंदुस्तान के लोगो के लिए सही नहीं है| अब आप को मैं बताता हूँ कि विज्ञान हकीकत में अध्यात्म के आगे कितना टिकता है|

1) अध्यात्म आत्माओ में हमेशा विश्वास करता था और करता है लेकिन विज्ञान एक समय तक आत्माओ में विश्वास नहीं करता था लेकिन धीरे-धीरे विज्ञान को विश्वास होने लगा है कि आत्मा नाम कि भी कोई ऊर्जा है|

2) अध्यात्म हमेशा से प्रकृति शक्तियों में विश्वास करता था और करता है लेकिन अभी भी विज्ञान के सामने बहुत सारी ऐसी घटनाये होती जिसे वो देखता तो है लेकिन समझ नहीं पता या यूँ कहे वो सिद्ध नहीं कर पाता तो उन घटनाओ को अपवाद मान कर छोड़ देता है जैसे दक्षिण भारत में रामसेतु| अध्यात्म उसमे विश्वास करता है लेकिन विज्ञान तैरते हुए मौजूद पत्थरो को मरे हुए कोरल रीफ मान कर अध्यात्म से पल्ला झाड़ लेता है|

3) अध्यात्म में ऐसा माना जाता है कि मनुष्य अगर अपने शक्तियों को सही से पहचान ले तो वो अपनी आत्मा को जब चाहे अपने शरीर से बाहर निकाल सकता है और वापस भी ला सकता है लेकिन विज्ञान अभी भी इस पर स्पष्ट नहीं है क्यों कि उसके पास कोई सबूत नहीं है|

विज्ञान के अनुसार सनातन धर्म के वेदो को एक समय तक कोरी कल्पना मानता था लेखी जब धीरे धीरे उन वेदो के अर्थ सही साबित होते गए वैसे-वैसे विज्ञान बाध्य हो गया उन किताबो में विश्वास करने पर| जैसे ऋग्वेद में जो दुरी पृथ्वी और सूर्य के बिच बताई गई ठिक वही दुरी विज्ञान ने कई सालो के बाद बताई और ये वेद जिस समय लिखा गया था जो कि विज्ञान ने सिद्ध किया है तब विज्ञान नामक कोई शब्द था ही नहीं|

इसी अध्यात्म का विश्वास है कि जर्मनी और जापान जैसा देश हिंदुस्तान के कई सारे ग्रंथो पर अनुसंधान कर रहे है| जबकि हिंदुस्तान के लोग उन्ही वेदो से दूर भाग रहे है|

वैसे ऐसे ऐसे बहुत सारे उदहारण है जो कि सिद्ध करते है कि विज्ञान, अध्यात्म से बड़ा नहीं है बस अंतर ये है विज्ञान सबूत पर चलता है और अध्यात्म विश्वास, अनुभव और सिद्धांत पर चलता है|

लेकिन दुर्भाग्य सनातन धर्म का है कि पश्चिमी चतुराई जो कि हिंदुस्तानी पीढ़ियों को पढाई जाती है ये पढ़ी-लिखी पीढ़िया अध्यात्म से दूर भागते जा रहे है| लेकिन इनको ये नहीं पता कि आने वाला समय विज्ञान को अध्यात्म के तरफ ही मुड़ेगा|

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